हम सभी जानते हैं कि हमारी पृथ्वी दो तरह की गति करती है — एक, अपनी धुरी पर घूमना जिसे घूर्णन गति (Rotational Motion) कहा जाता है, और दूसरा, सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करना, जिसे परिभ्रमण गति (Revolutionary Motion) कहा जाता है। लेकिन हाल ही में वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की घूर्णन गति को लेकर चौंकाने वाला अवलोकन किया है।
विज्ञान जगत में हुई ताजा रिसर्च के अनुसार, पृथ्वी की घूर्णन गति पिछले कुछ वर्षों की तुलना में तेज हो गई है। इसका सीधा असर हमारे ‘एक दिन’ की लंबाई पर पड़ रहा है। मतलब, भविष्य में वो समय आ सकता है जब पृथ्वी पर अब तक का सबसे छोटा दिन दर्ज किया जाएगा। हालांकि यह बदलाव इतना सूक्ष्म होगा कि आम इंसान को इसका एहसास भी नहीं होगा, क्योंकि यह केवल माइक्रोसेकंड (एक सेकंड का लाखवां हिस्सा) के स्तर पर घटित हो रहा है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, साल 2020 तक पृथ्वी सामान्य गति से घूम रही थी, लेकिन हालिया खगोलीय गतिविधियों — जैसे पृथ्वी के कोर में हलचल, चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्व प्रभाव, समुद्री ज्वार-भाटा और जलवायु परिवर्तन — के चलते यह गति फिर से प्रभावित हो रही है।
पृथ्वी की बढ़ती गति से समय में बदलाव संभव, 2029 में घट सकता है एक सेकंड
आमतौर पर पृथ्वी को अपनी धुरी पर एक पूरा चक्कर लगाने में लगभग 86,400 सेकंड (यानि 24 घंटे) का समय लगता है। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि समय-समय पर इस अवधि में सूक्ष्म बदलाव होते रहते हैं — जो मिलीसेकंड के स्तर पर दर्ज किए जाते हैं। हालिया मापन में पाया गया है कि पृथ्वी की घूर्णन गति हल्के रूप से तेज़ हो गई है, जिससे दिन की लंबाई धीरे-धीरे कम हो रही है।
अगर यह गति यूं ही बढ़ती रही, तो साल 2029 तक समय गणना प्रणाली को दोबारा संतुलित करना पड़ सकता है। यानी हमारे कैलेंडर या घड़ियों में हम जैसे समय को जानते हैं, उसमें बदलाव की ज़रूरत पड़ेगी।
इस बदलाव का सीधा असर सैटेलाइट सिस्टम, GPS, इंटरनेट टाइम सर्वर और अन्य समय-निर्भर तकनीकों पर पड़ सकता है। इन्हीं खतरों से निपटने के लिए, IERS (International Earth Rotation and Reference Systems Service) समय-समय पर परमाणु घड़ियों में “लीप सेकंड” जोड़ती या घटाती है।
लेकिन इस बार स्थिति थोड़ी अलग है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि पृथ्वी की गति ऐसे ही बढ़ती रही, तो 2029 में इतिहास में पहली बार “माइनस लीप सेकंड” लागू करना पड़ सकता है, यानी समय को एक सेकंड कम करना होगा — जो अब तक कभी नहीं हुआ।
पृथ्वी का सबसे छोटा दिन: 2025 में 9 जुलाई को 1.34 मिलीसेकंड कम हुआ समय
इंटरनेशनल अर्थ रोटेशन एंड रेफरेंस सिस्टम सर्विस (IERS) और यूनाइटेड स्टेट नवल ऑब्जरवेटरी के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में 9 जुलाई को अब तक का सबसे छोटा दिन दर्ज किया गया। इस दिन पृथ्वी ने 24 घंटे से लगभग 1.34 मिलीसेकंड कम समय में एक पूरा चक्कर पूरा किया। इसके पहले, 22 जुलाई 2024 को भी पृथ्वी ने 1.36 मिलीसेकंड कम समय में घूर्णन पूरा किया था। हालांकि, इन दोनों दिनों के बीच का अंतर मात्र 0.2 मिलीसेकंड था, जो अत्यंत सूक्ष्म था और इसलिए सामान्य जीवन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
सबसे ताजे आंकड़ों के अनुसार, 5 अगस्त 2025 को भी पृथ्वी ने अपनी धुरी पर एक पूरा चक्कर 86,400 सेकंड से 1.51 मिलीसेकंड पहले पूरा किया। इसका मतलब यह है कि इस दिन का समय सामान्य 24 घंटे से थोड़ा छोटा था। हालांकि यह अंतर इतनी छोटी राशि का था कि आमतौर पर इसका किसी को एहसास नहीं होता, लेकिन यह समय गणना और तकनीकी प्रणालियों, जैसे GPS और सैटेलाइट सिस्टम्स, के लिए महत्वपूर्ण है।
पृथ्वी के घूर्णन में बदलाव: 2022 और 2024 के रिकॉर्ड के साथ नई वैज्ञानिक खोज
पृथ्वी की गति में होने वाले छोटे बदलावों को अब हम सामान्य रूप से समझने लगे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में ये बदलाव और तेज़ी से हुए हैं। 29 जून 2022 को पृथ्वी ने अपनी धुरी पर एक पूरा चक्कर 23 घंटे 56 मिनट और 4.4 सेकंड में पूरा किया, जो सामान्य 24 घंटे से लगभग 1.59 मिलीसेकंड कम था। इसके बाद, 5 जुलाई 2024 को पृथ्वी के घूर्णन में और भी कमी आई, जब दिन का समय 1.66 मिलीसेकंड छोटा रहा। यह बदलाव सूक्ष्म जरूर हैं, लेकिन पृथ्वी की घूर्णन गति में लगातार बदलाव होने के संकेत दे रहे हैं।
पृथ्वी के घूमने की स्पीड क्या है ?
पृथ्वी की गति के दो प्रकार:
घूर्णन गति: पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना, जो लगभग 24 घंटे में एक चक्कर पूरा करती है। इसकी गति करीब 1670 किमी/घंटा होता है।
परिक्रमण गति: पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना, जो 365 दिनों में पूरा होता है। इसकी गति लगभग 1,07,200 किमी/घंटा (30 किमी/सेकंड) होता है।
पृथ्वी की गति को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक:
- सूर्य और चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव: सूर्य और चंद्रमा की स्थिति पृथ्वी की घूर्णन गति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। इनके गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ज्वार-भाटा जैसी घटनाएँ होती हैं, जो पृथ्वी की गति को प्रभावित कर सकती हैं।
- पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव: पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में होने वाले बदलाव भी उसकी गति को प्रभावित कर सकते हैं, क्योंकि ये बदलाव पृथ्वी के अंदरूनी संरचनाओं के बदलाव से जुड़े होते हैं।
- द्रव्यमान का वितरण (आंतरिक और बाहरी): पृथ्वी के अंदर और उसके बाहरी हिस्सों में द्रव्यमान का असमान वितरण (जैसे पर्वत, महासागर और आंतरिक परतों का स्थान) पृथ्वी की घूर्णन गति में बदलाव ला सकता है। जब कोई बड़ा द्रव्यमान पृथ्वी के एक स्थान से दूसरे स्थान पर शिफ्ट होता है, तो इसका घूर्णन गति पर प्रभाव पड़ता है।
- बर्फ का पिघलना और समुद्र का जलस्तर परिवर्तन: ग्लेशियरों और बर्फ की चादरों का पिघलना, साथ ही समुद्र के जलस्तर में परिवर्तन, पृथ्वी के घूर्णन को प्रभावित कर सकता है। जैसे-जैसे बर्फ का पिघलना होता है, पृथ्वी का द्रव्यमान और घूर्णन गति बदल सकते हैं।
पृथ्वी की बढ़ती गति और उसके प्रभाव
- घूर्णन गति में तेजी: वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी की घूर्णन गति में हाल ही में तेज़ी देखी गई है, जो भविष्य में समय के माप और दैनिक जीवन को प्रभावित कर सकती है।
- समय में कमी: अगर यह गति बनी रही, तो दिन और रात का समय थोड़ा कम हो सकता है, जिससे हमें समय समायोजन के लिए नई रणनीतियाँ अपनानी पड़ सकती हैं।
- नेगेटिव लीप सेकंड: अब तक समय को सटीक रखने के लिए लीप सेकंड जोड़ा जाता रहा है, लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि भविष्य में नेगेटिव लीप सेकंड यानी एक सेकंड घटाने की जरूरत पड़ सकती है।
- तकनीकी प्रभाव: इस बदलाव का असर संचार, नेविगेशन सिस्टम और अन्य सटीक उपकरणों जैसे जीपीएस और एटॉमिक घड़ियाँ पर पड़ सकता है। ये प्रणालियाँ सूर्य, चंद्रमा और तारों की स्थिति पर आधारित सोलर टाइम का उपयोग करती हैं।
- आम जीवन पर असर: हालांकि, कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह परिवर्तन इतना सूक्ष्म हो सकता है कि आम लोग इसे महसूस नहीं करेंगे, लेकिन तकनीकी सिस्टम पर इसका गहरा प्रभाव हो सकता है।
- दीर्घकालिक प्रभाव: वैज्ञानिकों के विभिन्न शोधों में इस विषय पर अलग-अलग अनुमान लगाए गए हैं, और यह देखना बाकी है कि पृथ्वी की बढ़ती गति का दीर्घकालिक प्रभाव क्या होगा।










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