पृथ्वी पर होने वाले प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने कई प्रयास किए हैं और कई मायनों में यह प्रयास सफल भी रहे हैं। लेकिन कई बार ऐसा भी देखा गया है कि बड़े से बड़े प्रयास भी वह मूल रूप नहीं ले पाते जिससे पृथ्वी पर हो रही घटनाओं की सटीक पता लगाया जा सके कि ये घटनाएं आखिर कैसे और क्यों हो रही हैं ? ऐसे में अंतरिक्ष से पृथ्वी पर नजर रखकर सटीक जानकारियों को जुटाना और सही आकलन के जरिए प्राकृतिक चुनौतियों से निपटने के लिए इसरो और नासा ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इसरो और नासा ने मिलकर एक ऐसे मिशन की तैयारी की जिसमें वर्षों लग गए, लगभग 10 वर्षों से ज्यादा समय तक चले प्रयोगों के बाद NISAR MISSION बन कर तैयार हुआ।
क्या है यह निसार मिशन ?
NISAR मिशन इसरो और नासा का पहला संयुक्त सेटेलाइट है जिसे इसरो के जीएसएलवी F 16 रॉकेट द्वारा 30 जुलाई को शाम 5:40 श्री हरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया गया। NISAR मिशन के अंतर्गत इस्तेमाल किए गए GSLV F 16 रॉकेट या satellite को 98.40 के झुकाव के साथ 743 कि.मी. की सूर्य समकालिक कक्षा में प्रक्षेपित किया गया। जिसके जरिए यह सेटेलाइट पूरे विश्व को स्कैन करेगा और 12 दिनों के अंतराल पर हर तरह के मौसम तथा दिन और रात के आंकड़े प्रदान करेगा। इसके अलावा पृथ्वी की सतह की निगरानी के साथ-साथ भूकंप, बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियरों के पिघलने जैसी प्राकृतिक आपदाओं की सटीक और बेहतर पूर्वानुमान लगाएगा। NISAR MISSION अब तक के सबसे महंगे पृथ्वी अवलोकन मिशनों में से एक है जिसकी कुल अनुमानित लागत लगभग 1.5 बिलियन है।
NISAR सेटेलाइट का मुख्य काम
इस सेटेलाइट मुख्य कार्य भूमि की हेल्थ को मॉनिटर करना और हेल्थ मॉनिटर करने का मतलब इसकी आई शीट को मॉनिटर करना, धरती पर होने वाले लैंडस्लाइड या भूसंखलन के खतरे को मॉनिटर करना, समुद्र को मॉनिटर करना, डिजास्टर मैनेजमेंट में भूकम्प को मॉनिटर करेंगे, और ऐसे प्राकृत्तिक खतरे जो धरती की हेल्थ को नुकसान पहिचाये को मॉनिटर करना है।
अंतरिक्ष में कैसे काम करेगा NISAR सेटेलाइट ?
लगभग 2392 Kg वजनी निसार एक अनूठा पृथ्वी ऑब्जर्वर सेटेलाइट है और दो अलग-अलग आवृत्ति वाले सिंथेटिक अपर्चर रडार अर्थात SAR से पृथ्वी की निगरानी करने में मदद मिलेगी। NISAR मिशन दोनों एजेंसियों अर्थात इसरो और नासा की तकनीकी विशेषज्ञता का संयोजन है, जिसमें नासा ने L-Band सिंथेटिक अपर्चर रडार, एक उच्च गति दूरसंचार उपप्रणाली, जीपीएस रिसीवर और 12 मीटर का अनफरेबल एंटीना प्रदान किया है। इसरो ने अपनी ओर से S-Band SAR पेलोड, दोनों पेलोड को समायोजित करने के लिए अंतरिक्ष यान बस जीएसएलवी एफ F16 रॉकेट और सभी संबंधित प्रक्षेपण सेवाएं प्रदान की हैं। मतलब कि इस मिशन में कुछ तकनीक और चीजें नासा द्वारा तैयार की गई है और कुछ तकनीक और चीजें भारत के इसरो द्वारा तैयार की गई हैं जो साथ मिलकर अंतरिक्ष में सेटेलाइट को पहुंचाने में और वहां से पृथ्वी का अवलोकन करने में मददगार साबित होगी। साथ ही इसरो और नासा के साझा तकनीकों और प्रयासों का उपयोग विभिन्न प्रकार के अनुप्रयोगों के लिए किया जाएगा। जिसमें पृथ्वी के पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन का अध्ययन भी शामिल है।
क्या है SAR ?
रिमोट सेंसिंग के लिए दो प्रकार के रडार होते हैं। पहला इनक्टिव रडार जो सिर्फ पृथ्वी से जो Rays/waves आ रही हैं उनको पकड़ता हैं, उसको एनालिसिस करते हैं। दूसरा SAR अर्थात सिंथेटिक अपर्चर रडार जो पावरफुल Rays /Waves को पृथ्वी में भेजता है और यहीं Rays /Waves पृथ्वी से परावर्तित हो कर आती है तो यह रडार उनको रिसीव करके पृथ्वी की डायमेंशन या उसकी फोटोग्राफ या उसकी डाटा को कलेक्ट किया जाता है। सिंथेटिक अपर्चर रडार दो अलग-अलग फ्रीक्वेंसी में काम करता है,एल-बैंड और एस-बैंड। इसकी सबसे अच्छी विशेषता यह है कि यह वर्षा और कोहरे जैसी मौसम की स्थितियों को भेदकर, दिन में, रात में हर समय देख सकता है अर्थात 24X7 यह सेटेलाइट पृथ्वी को देख सकती है।
पृथ्वी की प्रक्रियाओं को अध्ययन करने वाले अंतरिक्ष जनित सिंथेटिक अपर्चर रडार यानी कि एसएआर की अवधारणा 1970 के दशक की है, जब नासा ने CSAT लॉन्च किया था। हालांकि यह मिशन कुछ ही महीनों तक चला लेकिन इसने अपनी तरह की पहली तस्वीरें तैयार की जिन्होंने आने वाले दशकों के लिए रिमोट सेंसिंग परिदृश्य को बदल दिया। CSAT ने नासा के शटल इमेजिन रडार कार्यक्रम और बाद में शटल रडार टोपोग्राफी मिशन को जन्म दिया।
NISAR मिशन में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख तकनीकों की बात करें तो इसमें सिंथेटिक अपर्चर रडार यानी कि SAR, ड्यूल फ्रीक्वेंसी रडार, बड़े एंटीना, ऑल वेदर क्षमताएं, पृथ्वी की सतह की 240 कि.मी. चौड़ी इमेजिंग जैसी उन्नत तकनीक इसमें शामिल है। जिससे बारीक से बारीक जानकारियां भी मिल पाएंगी।
NISAR मिशन से प्राप्त डाटा का क्या होगा ?
NISAR मिशन से मिलने वाला डाटा इस पूरी पृथ्वी को संरक्षित करने में बहुत काम आएगा। यह डाटा उत्पाद मिशन के विज्ञान केंद्रीय क्षेत्रों, पारिस्थितिकी तंत्र, क्रायोस्फीयर और ठोस पृथ्वी के उपयोगकर्ताओं की आवश्यकता के अनुरूप होंगे। साथ ही मिट्टी में नमी और जल संसाधन निगरानी जैसे बुनियादी अनुसंधान के अलावा भी इनके कई उपयोग होंगे। प्राप्त डाटा को आसानी से सुलभ बनाया जाएगा और डाटा कैपेसिटी को देखते हुए इसे प्रोसेस और स्टोर किया जाएगा जिससे कभी भी आसानी से डाटा को एक्सेस किया जा सके और ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल की जा सके।
निसार मिशन अन्य पृथ्वी मिशनों से अलग कैसे है ?
NISAR मिशन बाकी अन्य मिशनों से अलग है क्योंकि इसकी विशेषताएं अलग हैं। निसार पहला पृथ्वी ऑब्जर्वर सेटेलाइट है जिसमें दो तरह के रडार होंगे। 10 इंच जो कि 25 सेंटीमीटर वेवलेंथ वाली एल-बैंड प्रणाली और 4 इंच यानी कि 10 सेंटीमीटर वेवलेंथ वाली एस-बैंड प्रणाली। निसार के ये दोनों रडार सिग्नल पृथ्वी की सतह पर मौजूद विशेष घटनाओं पर अलग-अलग अपनी प्रतिक्रिया देंगे। जैसे कि छोटी वेवलेंथ पत्तियों और खुरदुरी सतहों जैसी छोटी वस्तुओं के प्रति अधिक संवेदनशील होगी। जबकि लंबी वेवलेंथ पत्थरों और पेड़ों के तनों जैसी बड़ी संरचनाओं के प्रति अधिक प्रक्रिया शील वहां पर देखने को मिलेगी। इसीलिए निसार के दोनों रडार सिग्नल पृथ्वी की सतह पर मौजूद विशेष चीजों की बारीकियों पर अलग-अलग अपनी-अपनी प्रतिक्रिया देंगे। प्रत्येक सिग्नल किस चीज के प्रति संवेदनशील है या नहीं ? इसका लाभ उठाकर शोधकर्ता अलग-अलग वेवलेंथ वाली समान विशेषताओं का अवलोकन करते हुए किसी भी रडार की तुलना में अधिक व्यापक श्रेणी की विशेषताओं का अध्ययन कर सकते हैं जो कि बाकी मिशनों से इसे अलग बनाता है।
आगे की राह
बरसों से पृथ्वी पर होने वाले हर एक घटनाक्रम पर वैज्ञानिकों द्वारा उठाए गए अहम कदमों के जरिए बेहतर परिणाम मिले हैं। निसार मिशन के सफलतम प्रयास के जरिए इसमें और चार चांद लग जाएंगे। साथ ही धरती पर होने वाली हर एक घटना पर भारत की नजर होगी और तो और इसरो और नासा के साझा अभ्यास से किसी भी तरह की आपदा से निपटने के लिए सटीक और सार्थक जानकारी समय से पहले मिल सकेगी और भविष्य में होने वाले घटनाक्रम के लिए तैयार रहने, शोध करने या बेहतर निर्णय लेने में बहुत मददगार साबित होगी।
(Source: DD NEWS)










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